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कैप्टन विक्रम बत्रा

यह देश हैं वीर जवानों का,अलबेलों का, मस्तानों का………… यह गाना मानो विक्रम बत्रा पर बिल्कुल परफेक्ट बैठता है l देश के लिए शहीद हुए विक्रम बत्रा असल जिंदगी में बहुत खुश मिज़ाज,मस्तमौले और मोहब्बत से भरे हुए थे।

कैप्टन विक्रम बत्रा जीवन परिचय

कैप्टन विक्रम बत्रा (09 सितम्बर 1974 – 07 जुलाई 1999) भारतीय सेना के एक अधिकारी थे जिन्होंने कारगिल युद्ध में अद्भुत वीरता का परिचय देते हुए वीरगति प्राप्त की थी। उनकी शहीदी के बाद भारत ने उन्हें सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया। विक्रम बत्रा की माता जी को  श्रीरामचरितमानस में गहरी श्रद्धा थी तो उन्होंने दोनों का नाम लव और कुश रखा। लव यानी विक्रम और कुश यानी विशाल, विक्रम ने अपने नाम के मतलब को पूर्ण रूप से सिद्घ कर दिया। सही कहा गया नाम का असर व्यक्ति के स्वभाव पर जरूर पड़ता हैं।

कैप्टन विक्रम बत्रा कैसे हुए सेना में भर्ती

विज्ञान विषय में स्नातक करने के बाद विक्रम बत्रा का चयन सीडीएस के जरिए सेना में हो गया। जुलाई 1996 में उन्होंने भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून में प्रवेश लिया। दिसंबर 1997 में प्रशिक्षण समाप्त होने पर उन्हें 6 दिसम्बर 1997 को जम्मू के सोपोर नामक स्थान पर सेना की 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति मिली। उन्होंने 1999 में कमांडो ट्रेनिंग के साथ कई प्रशिक्षण भी लिए। पहली जून 1999 को उनकी टुकड़ी को कारगिल युद्धमें भेजा गया। हम्प व राकी नाब स्थानों को जीतने के बाद विक्रम को कैप्टन बना दिया गया।

कारगिल का शेर

पदोन्‍नति के बाद कैप्‍टन विक्रम बत्रा को श्रीनगर-लेह मार्ग के बेहद करीब स्थिति 5140 प्‍वाइंट को दुश्‍मन सेना से मुक्‍त करवाकर भारतीय ध्‍वज फहराने की जिम्‍मेदारी दी गई. कैप्‍टन विक्रम बत्रा ने अपने अद्भुत युद्ध कौशल और बहादुरी का परिचय देते हुए 20 जून 1999 की सुबह करीब 3:30 बजे इस प्‍वाइंट पर कब्‍जा जमा लिया था।कैप्टन विक्रम बत्रा ने जब इस चोटी से रेडियो के जरिए अपना विजय उद्घोष ‘यह दिल मांगे मोर’ कहा तो सेना ही नहीं बल्कि पूरे भारत में उनका नाम छा गया। इसी दौरान विक्रम के कोड नाम शेरशाह के साथ ही उन्हें ‘कारगिल का शेर’ की भी संज्ञा दे दिया।

कृष्ण उपदेश-मृत्यु से कैसा भय

इस जीवन का मात्र एक ही सत्य है और वो है मृत्यु। जब इस बात को हम जानते ही हैं तो इंसान मौत से डरता क्यों हैं? जीवन की अटल सच्चाई से भयभीत होना वर्तमान खुशियों को बाधित करता है। इसलिए किसी भी प्रकार का डर नहीं रखना चाहिए। यही उपदेश मानो विक्रम को भी मिला हो वो अपनी मृत्यु से डरे नहीं बल्कि मृत्यु को गले से लगा लिया।

नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत

ये भी द्वितीय अध्याय का श्लोक है। इसमें बताया गया है कि आत्मा को कोई शस्त्र काट नहीं सकता, आग जला नहीं सकती, पानी भिगो नहीं सकता, हवा सुखा नहीं सकती। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि आत्मा शरीर बदलती है, कभी मरती नहीं है। इसीलिए किसी की मृत्यु पर शोक नहीं करना चाहिए।

देशभक्त हो तो विक्रम बत्रा जैसा

हतो वा प्राप्यसि स्वर्गम्, जित्वा वा भोक्ष्यसे महिम्।तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय:॥

*(द्वितीय अध्याय, श्लोक 37)

अर्थ: यदि तुम (अर्जुन) युद्ध में वीरगति को प्राप्त होते हो तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा और यदि विजयी होते हो तो धरती का सुख पा जाओगे… इसलिए उठो, हे कौन्तेय (अर्जुन), और निश्चय करके युद्ध करो।

विक्रम बत्रा ने इसी धर्म का पालन किया देशभक्ति दिखाई और अंत तक युद्ध करते करते वीर गति को प्राप्त हुए।

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