Analysis

कोरोना काल में शिक्षा :70 बच्चों की कक्षा में कैसे बनाई जा सकेगी सामाजिक दूरी…. कोरोना काल में भारत की शिक्षा व्यवस्था हुई बेपटरी।

कोरोना काल में शिक्षा

ई- लर्निंग, यह एक ऐसा शब्द है जोकि इन दिनों चर्चा में है। कोरोना काल में जहां एक ओर सम्पूर्ण विश्व बंदी में है, तो वहीं शिक्षा का मंदिर कहे जाने वाले स्कूल और कॉलेज बंद पड़े है। समस्या बड़ी है लेकिन डिजिटल के इस युग में इस समस्या का भी हल खोज लिया गया है। लेकिन प्रश्न ये है कि क्या डिजिटल तरीके से मिलने वाली शिक्षा हर उम्र के बच्चों के लिए मददगार साबित होगी?

‌हालांकि सरकार जिस तरह से अनलॉक प्रक्रिया के माध्यम से बाजार, धार्मिक स्थल और दफ्तरों को खोलकर देश की अर्थवयवस्था को पटरी पर ला रही है, तो वहीं शिक्षा जोकि किसी भी सभ्य समाज की  सबसे पहली प्राथमिकता है, उसके लिए भी सुचारू तरीके से प्रबंध कर सकती थी लेकिन क्या करें,

जिस देश में पैसों के द्वारा पद खरीदा बेचा जाता है।

वहां शिक्षा की बोली भी सरे आम लगाई जाती है।

ऐसे में भारत के कुछ चुनिंदा राज्यों के स्कूल और कॉलेज संस्थानों को छोड़ दें तो यहां शिक्षा के दलाल बैठकर शिक्षा की बोली लगाया करते है। जिसको हम इन उदाहरणों के माध्यम से समझ सकते हैं।

निजी स्कूल और सरकारी संस्थान

कोरोना काल में शिक्षा व्यवस्था
कोरोना काल में चरमराती शिक्षा व्यवस्था

भारत में अगर कोई बिजनेस आसानी से शुरू किया जा सकता है। तो वह है स्कूल और कॉलेज। ऐसे में सरकारी स्कूल कॉलेज को छोड़कर यदि बात की जाए निजी शिक्षण संस्थानों की तो यहां पैसे के बल पर इंजीनियरिंग से लेकर डॉक्टरी तक की डिग्रियां मिल जाया करती है।

ऐसे में कोरोना काल के समय स्थिति और खराब हो जाती है, क्यूंकि जहां मध्यम वर्गीय परिवारों की बंदी के कारण आय का जरिया प्रभावित हुआ है, ऐसे में अब सरकार भी निजी  शिक्षण संस्थानों पर शिकंजा नहीं कस रही है। तो ऐसे में निजी शिक्षण संस्थानों द्वारा फ़ीस का नोटिस मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। इसके अलावा शिक्षा क्षेत्र में पांव पसारता आरक्षण भी कहीं न कहीं शिक्षा के बराबर हक की बात का खंडन करता है।

बात करें सरकारी स्कूल और कॉलेज की तो प्राइमरी स्तर पर यूपी और बिहार राज्यों की शिक्षा व्यवस्था मुफ्त होने के बाद भी असरदार साबित नहीं हो पा रही है। आज भी ग्रामीण इलाकों में रहने वाले परिवार स्कूल से कहीं अधिक महत्व काम और रोजी रोटी को देते है। ऐसे में डिजिटल शिक्षा तो ग्रामीण क्षेत्रों के लिए एक स्वप्न की भांति है। ठीक उसी तरह से सरकारी स्कूलों में छात्रों की अधिक संख्या के चलते वहां सामाजिक दूरी का पालन करवाना मुश्किल सा प्रतीत हो रहा है।

तो अब सवाल ये है कि क्या अब सरकार सब पढ़े सब बढ़े की बात को साकार कर पाएगी, क्यूंकि रिपोर्ट्स के मुताबिक कोरोना से छुटकारा पाने में अभी एक लंबा वक्त तय करना पड़ सकता है। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था की भूमिका को निर्धारित करना जरूरी हो जाता है। क्योंकि भविष्य की नींव वर्तमान पीढ़ी के होनहारों से तैयार की जानी है और शिक्षा उसका एक मात्र जरिया है। 

स्कूल चले हम
स्कूल चले हम

मैकाले की शिक्षा पद्धति और आधुनिक शिक्षा व्यवस्था

वर्तमान शिक्षा प्रणाली लार्ड मैकाले की शिक्षा का ही संशोधित रूप है। ऐसे में सही कहा गया है कि,

मैकाले की शिक्षा ने बनाए दुराचारी और व्यभिचारी,

आर्यवृत्त की शिक्षा पुनं पैदा करें बह्राचारी।

आजादी के बाद देश में ऐसी शिक्षा व्यवस्था लागू करने की मांग की गई जो रोजगारपरक हो लेकिन वर्तमान में जो शिक्षा लागू हुई है, वह समाज में पूंजीवाद को बढ़ावा दे रही है। ऐसी शिक्षा का क्या फायदा जो भाई को भाई से लड़ना सीखा दें, जो मानव में भेदभाव की चिंता को और बढ़ा दें।

ऐसे में जरूरी है कि सबको शिक्षा मिले, लेकिन एक बड़ा सवाल यह भी है कि इस शिक्षा का उद्देश्य क्या हो। क्योंकि प्राचीन समय में शास्त्रों, वेदों और उपनिषदों का ज्ञान दिया जाता था। साथ ही बच्चे में प्रारंभ से ही अपनों से बड़ों का आदर करना, स्त्री के प्रति संवेदनशीलता और भाईचारे का पाठ पढ़ाया जाता था। लेकिन आजकल की शिक्षा व्यवस्था प्रारंभ से ही बच्चे को एकल प्रवृत्ति में रहना सीखा देती है। एक बच्चा जो भाई को भाई जैसा आत्मसात करने मेंं पीछे हट रहा है वह कैसे आने वाले सुसंस्कृत समाज की नींव को तैयार कर सकेगा।

आधुनिक ज्ञाता और नीति निधार्रक कहेंगे कि समय के साथ विज्ञान और प्रौद्योयोगिकी की शिक्षा आवश्यक है, लेकिन जरूरत इस बात को समझने की है कि क्या औद्योगिक शिक्षा के आगे संस्कारवान पहलूओं को ध्यान में नहीं रखा जा सकता है। क्या स्कूल में 8 घंटे से ज्यादा रहने वाले बच्चों को संस्कारित ज्ञान देना गलत है। क्योंकि अगर यह गलत और व्यर्थ माना जा रहा है तो वो दिन दूर नहीं, जब समाज में दी जा रही शिक्षा ही मानव जाति के नरसंहार का कारण बनें।

कोरोनाकाल में हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि आत्मनिर्भर भारत की नींव मात्र विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बल पर डाली जाए या प्राचीन शिक्षा व्यवस्था को भी शामिल किया जाए। तभी हम एक खुशहाल कल की तैयारी कर सकेंगे।

#सम्बंधित:- आर्टिकल्स

Tags

Anshika Johari

I am freelance bird.

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Close
Close