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विकास दुबे केस : प्रशासन और राजनीति में हावी हो रहा भ्रष्टाचार कैसे विकास दुबे जैसे अपराधियों को संरक्षण दे रहा है?

विकास दुबे केस
विकास दुबे केस

विकास दुबे केस : आज देश भर में चर्चित खबरों में विकास दुबे का केस बहुत महत्वपूर्ण रूप से चल रहा है। इस केस में 8 पुलिसकर्मियों की बेरहमी से हत्या के बाद विकास दुबे का नाटकीय रूप से गिरफ्तार होना और घटिया फिल्मों की तरह एनकाउन्टर कर दिया जाना पुलिस और प्रशासन पर सवाल उठाते हैं।

कई बार भारत में ऐसे केस आते हैं चार दिन सुर्खियों में रहते हैं फिर सब खो जाते हैं। कुछ वर्ष पूर्व प्रतापगढ़ में जियाउल हक नामक पुलिसकर्मी को पीट पीटकर मार दिया गया था। कुछ महिनों तक वो भी केस खूब खबरों में था पर वह भी समय के साथ बन्द हो गया। अपराधी आज भी खुलेआम घूम रहे हैं। इस प्रकार के सभी मामलों में राजनीतिक हस्तक्षेप बहुत होता है जिससे ये केस लालफीताशाही के शिकार हो जाते हैं।

भ्रष्टाचार एक ऐसी व्यवस्था है जो ऊपर से नीचे की ओर चलती है। इसमें हर भ्रष्टाचारी व्यक्ति अपने ऊपर वाले व्यक्तियों को दोषी ठहराता मिलता है। हमें यह समझना होगा कि पुलिस के ऊपर राज्य सरकार का नियंत्रण होता है। इस प्रकार से जनता के प्रति जिम्मेवारी सरकार की बनती है कि वो पुलिस से जवाबतलब करें।

यहाँ प्रश्न उठता है

सरकार क्यों नहीं इस प्रकार के मामलों पर संज्ञान लेती है? भ्रष्टाचार की जड़ क्या सिर्फ सरकार में है या पुलिस प्रशासन की व्यवस्था में भी?

सरकार आज अपनी व्यवस्था लागू कराने के लिए पुलिस पर निर्भर रहती है। इसी पुलिस का लाभ वह अपनी स्वयं की व्यवस्था के लिए भी करने लगी है। जैसे किसी मामले में अपने रिश्तेदारों और परिचितों को रियायत देना, जमीनी विवादों को अपने पक्ष में लेना तथा अपनी विशेष स्थिति को समाज में स्थापित कराने आदि के लिए। इस तरह जब राजनेता और मंत्री लोकसेवा में लगे प्रशासकों को अपनी सेवा में प्रयोग करने लगते हैं तो भ्रष्टाचार की नींव पड़ने लगती है।

यहाँ पर पुलिस को भी राजनीतिक फायदा मिलने की गुंजाइश बढ़ जाती है। जैसे उनके पदोन्नति में तथा उनके स्थानांतरण में नेता सिफारिश कर देते हैं। इस प्रकार वह सत्ता के हाथ की कठपुतली बन जाती है। राजनीति और प्रशासन के इस प्रकार के गठजोड़ से उत्पन्न भ्रष्टाचार बहुत भयानक हो सकता है। यह किसी राज्य के विकास से लेकर सामान्य नागरिक के मौलिक अधिकार तक को बहुत अधिक क्षति पहुँचा सकता है। इसका उदाहरण हम विकास दुबे के एनकाउंटर से जान सकते हैं कि किस प्रकार कई नेताओं की छवि बचाने के लिए उसका असंवैधानिक रूप से एनकाउंटर कर दिया जाता है।

अब यहाँ प्रश्न उठता है –

इन सब में अपराधियों को संरक्षण कैसे मिलता है?

इसके लिए हमें अपराधी और पुलिस के तथा अपराधी और राजनेताओं के बीच के रिश्ते को जानना होगा। आज हमें पता है कि हमारे देश के अधिकतर नेताओं पर जघन्य अपराधों के केस तक चल रहे हैं। उनमें से कईयों पर हत्या,बलात्कार तक के केस दर्ज हैं। ऐसे लोग ही हमारी राजव्यवस्था में नीतियों को बना रहे हैं।

इन्हीं राजनेताओं के द्वारा संरक्षण प्राप्त अनेक अपराधी आगे जाकर अपने अपराध का साम्राज्य बना लेते हैं। अनेक नेता अपना काम निकालने के लिए तथा अनेक अपराधिक कृत्यों को अंजाम देने के लिए इन्हीं अपराधियों पर आश्रित होते हैं। पुलिस द्वारा इसके रिश्ते भी इसी प्रकार आपसी फायदे के लिए बन जाते हैं। यही जाकर आगे विकास दुबे जैसे अपराधी बन जाते हैं। साथ ही इनके नेटवर्क का विस्तार भी बहुत हो जाता है जिससे आगे जाकर इसी प्रशासन के लिए यह खतरा बनते हैं।

जब इस प्रकार का नेटवर्क पुलिस, राजनेताओं और अपराधियों के बीच है तो इसका समाधान क्या होगा?

अगर हम न्यायिक समाधान की बात करें तो हमारे सामने अदालत में जाने का विकल्प ज़रूर है पर आपने देखा कि विकास दुबे के खिलाफ 60 से ज्यादा केस थे एक बार उम्रकैद तक हो जाने के बाद वह राजनीतिक दांवपेंच लगाकर बाहर निकल आता है। इन सबसे सामान्य नागरिकों का मनोबल नीचे होता है। हमारे पास फिर से सर्वोच्च न्यायालय का द्वार खुला हुआ है। इसका एक समाधान यह भी हो सकता है कि हिस्ट्रीशीटर अपराधियों के लिए फास्ट ट्रायल कराए जाएं तथा फेक एनकाउंटर जैसे मामलों की भी स्वतंत्र संस्थाओं द्वारा निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए पर इस प्रकार के मामलों को बिना राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक इमानदारी के नहीं सुलझाया जा सकता।

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