Indian lawAnalysis

कर्मचारियों के वेतन पर गृह मंत्रालय ने क्या कहा, आपको जानना चाहिए…

आपको ज्ञात होगा कि गृह मंत्रालय (एमएचए) ने 29 मार्च को एक परिपत्र जारी किया था, जिसमें उसने लोकडाउन के दौरान श्रमिकों को पूरी मजदूरी देने का निर्देश दिया था। उस अधिसूचना में यह भी चेतावनी दी गई है कि यदि वे परिपत्र में दिए गए निर्देशों का पालन नहीं करते हैं तो नियोक्ताओं को कानूनी परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। वहीं परिपत्र के मसौदे तैयार किए जाने के बाद, कंपनियों द्वारा इसकी संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं भी दायर की गईं- कर्मचारियों को बिना किसी काम के पूर्ण वेतन का भुगतान करना अनुचित था और यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

इसको देखते हुए न्यायमूर्ति एनवी रमना की अगुवाई वाली शीर्ष अदालत की तीन-न्यायाधीश पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को अनुच्छेद 14 की संवैधानिक वैधता पर कई कंपनियों द्वारा दायर याचिकाओं पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करने की अनुमति दी। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से दो सप्ताह के भीतर जवाब देने और गृह मंत्रालय द्वारा तैयार परिपत्र का स्पष्टीकरण देने को कहा है।

इस पर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने गृह मंत्रालय (एमएचए) द्वारा जारी परिपत्र पर रोक लगा दी, जिसमें एमएसएमई सहित निजी कंपनियों को अपने कर्मचारियों को पूरा वेतन देने के लिए कहा गया था। अदालत ने केंद्र और राज्यों को श्रमिकों को भुगतान न करने पर कारखानों, फर्मों आदि के खिलाफ कोई भी कठोर कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने इस अधिसूचना को ‘सर्वव्यापी आदेश’ करार दिया है और केंद्र से अपने परिपत्र पर पुनर्विचार करने को भी कहा है।

आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले आदेश को वापस ले लिया है जहां वह गृह मंत्रालय (एमएचए) द्वारा जारी परिपत्र के साथ रुकी थी, जिसमें एमएसएमई सहित निजी कंपनियों को अपने कर्मचारियों को पूर्ण वेतन देने के लिए कहा गया था।

17 मई, 2020 को, गृह मंत्रालय (एमएचए) ने एक नया परिपत्र जारी किया था और 29 मार्च, 2020 को अपने पिछले परिपत्र को निरस्त कर दिया है। जिसमें नए परिपत्र में लोगों के आंदोलन से संबंधित प्रक्रियाओं के छह सेटों का उल्लेख है, लेकिन यह नहीं है 29 मार्च को जारी अधिसूचना शामिल करें और ताजा परिपत्र सोमवार यानी 18 मई, 2020 से लागू हुआ।

गृह मंत्रालय (एमएचए) ने 29 मार्च को एक परिपत्र जारी किया जिसमें कहा गया था कि सभी नियोक्ताओं को वेतन में कटौती के बिना कर्मचारियों को मजदूरी का भुगतान करना होगा, भले ही कोरोनोवायरस लॉकडाउन के कारण कंपनी बंद क्यों न हो।

29 मार्च को अधिसूचना में यह भी कहा गया था, की ‘सभी नियोक्ता, चाहे वह उद्योग में हों या दुकानों और वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों में, अपने श्रमिकों के वेतन का भुगतान उनके कार्यस्थलों पर, नियत तिथि पर, बिना किसी कटौती के, उनकी अवधि के लिए करेंगे।

सरकार के इस कदम से 29 मार्च के अपने पिछले आदेश को वापस लेने के बाद, ट्रेड यूनियन नेता व्यापक रूप से इस कदम की आलोचना कर रहे थे। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह लॉकडाउन के दौरान कर्मचारियों को भुगतान किए बिना नियोक्ताओं को दूर जाने की अनुमति देता है। वहीं ट्रेड यूनियन का विचार था कि यदि कंपनियों द्वारा श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी का भुगतान नहीं किया जाता है, तो कर्मचारी लॉकडाउन को कैसे बनाए रखेंगे। बात सही नजर आती है।

एक तरफ, जहां ट्रेड यूनियन ने आदेश की आलोचना की, वहीं नियोक्ताओं ने सरकार के फैसले का स्वागत किया है। नियोक्ताओं ने कहा है कि लॉकडाउन के समय, हमें ‘नो वर्क, नो पे’ पॉलिसी से चिपके रहना चाहिए। उनका विचार है कि इस कठिन समय के दौरान कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन दिया जाना चाहिए, लेकिन कर्मचारियों को भुगतान करने के लिए नियोक्ताओं ने कोई फंड क्यों नही दिया है।

इसीलिए 29 मार्च के आदेश के बाद, कई याचिकाकर्ताओं ने कहा कि जब महामारी के कारण उत्पादन शून्य या न्यूनतम होता है, तो कर्मचारियों को पूरा वेतन नहीं दिया जा सकता क्योंकि इससे कई छोटी और मझोली कंपनियों का कामकाज बंद हो सकता है। याचिकाकर्ताओं ने आगे कहा कि बिना काम के पूर्ण वेतन से कंपनियों का स्थायी बंद हो जाएगा जो अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है।

Tags

Javed Ali

जावेद अली जामिया मिल्लिया इस्लामिया से टी.वी. जर्नलिज्म के छात्र हैं, ब्लॉगिंग में इन्हें महारथ हासिल है...

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Close
Close