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लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली मीडिया आज शायद अपना रास्ता भटक गई है…

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ

आज हमारा देश भारत जिन भी परिस्थितियों से गुजर रहा है, उनमें परिवर्तन लाने के लिए जनसंचार माध्यमों में सकारात्मकता लाना बेहद जरूरी है। ऐसे में मीडिया जोकि एक स्तंभ की तरह है, किंतु अब यह स्तंभ मिशन के रूप में कार्य न करके एक उद्योग के रूप में स्थापित हो गया है। जिसके चलते मीडिया की वर्तमान शैली पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मार्कडेय काटजू ने भी भारत की वर्तमान मीडिया पर नियंत्रण की मांग की है।

ऐसे में अब यह प्रश्न हमारे सामने खड़ा है कि क्या वाकई मीडिया जनता के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन कर रही है? साथ ही यह कि आखिर मीडिया आम जनता मानती किसे है, उसके लिए शोषितों की आवाज उठाना ज्यादा जरूरी है या टीवी पर किसी सेलिबिट्री और नेताओं से जुड़े मुद्दे दिखाना।

आज कागज का कलम से मैं बैर कराने वाली हूं,

मीडिया की सच्चाई को मैं खुले आम बताने वाली हूं,

मीडिया जिसको लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होना था,

खबरों की दुनिया में जिसको पावन होना था,

आज दुनिया समझ गई कि खेल यह बेहद गंदा है,

मीडिया और कुछ नहीं, टीआरपी कमाने का एक धंधा है।

मीडिया का बदलता स्वरूप

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया
मीडिया का आज उसका मुख्य उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ टीआरपी कमाना रह गया है

मीडिया के बदलते स्वरूप को देखते हुए लगता है कि आज उसका मुख्य उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ टीआरपी कमाना रह गया है, जिसके चलते सुबह चाय की प्याली के साथ आपको जो सुनने को मिलता है। वही समाचार रात को खाने के वक्त भी सुनने को मिल जाता है। तो वहीं मीडिया में अपराधिक घटनाओं को सनसनी दिखाकर फैलाया जाता है, जैसे कि समाज में चारों तरफ अपराध ही अपराध हो।

आज का मीडिया टीवी पर दिखाता है कि दो घंटे की बारिश से यातायात जाम। लेकिन जिन इलाकों में लोग लगातार पानी की समस्या से जूझ रहे है, कोई उनकी सुध तक नहीं लेता है। जिसे देखकर जोसेफ स्टीलन की कुछ पक्तियां याद आती है कि सिर्फ एक मौत शोकांत और असंख्य मृत्यु आकड़ा।

तो वहीं मीडिया की अभिव्यक्ति की आजादी आज कुछ ऐसी हो चली है कि हर कोई खबरों की सवेंदनशीलता को जाने बिना सब कुछ सोशल मीडिया के माध्यम से शेयर कर रहा है। ऐसे में वर्तमान परिदृश्य में न तो मीडिया की भाषा प्रभावी है और न ही उसकी विचार शैली। इतना ही नहीं टीवी पर दिखाया जाने वाला एंकर लीड का चेहरा आज किसी सेलिबिट्री से कम नहीं है, जिसके कारण यह पक्तियां उपयुक्त सिद्ध होती है कि

चल पड़ा युग जिस तरफ,

रूख तूने उसका जिधर मोड़ा,

कला, संस्कृति और साहित्य की खबरों को तूने क्यों छोड़ा,

हत्या, लूट और अपहरण की खबरें…..बढ़ा चढ़ाकर दिखा रही तू चंद पैसों के लिए,

तुझे अभिव्य़क्ति की आजादी मिली,

बता ए मीडिया किसके लिए?

राजनीतिक दल और मीडिया

आजकल मीडिया की दुनिया में पेड न्यूज, प्राइवेट ट्रीट्री, मीडिया नेट और कॉस मीडिया होल्डिंग जैसी विकृतियों का भी विकास हुआ है। इतना ही नहीं चुनाव आते ही विपक्षी दलों के खिलाफ स्टिंग आपरेशनों की बाढ़ और व्यक्ति विशेष को ही हमेशा टीवी पर दिखाकर मीडिया पैसा कमाने में लगी हुई है। तो वहीं कुछ मीडिया चैनल राइट विंग और लेफ्ट विंग में बंट गए हैं। जिनमें से कुछ सरकार की खामियों को ही टीवी पर दिखाते रहते है तो वहीं कुछ सरकार की तारीफों के पुल बांधते नहीं थकते। ऐसे में मीडिया जोकि एक लोक आंकाक्षा के रूप में शुरू हुई थी, वह अब जाकर एक बाजारवादी सोच पर खड़ी हुई है।

इसके अलावा बात करें सोशल मीडिया की। तो वह आजकल की युवा पीढ़ी द्वारा सबसे ज्यादा चलन में है। ऐसे में कई बार उसपर पोस्ट की गई फोटो और वीडियो समाज के बीच तनाव का कारण बनते देखी गई है। जिसका ज्वलंत उदाहरण है, उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में दो समुदायों के बीच घटित हुई हिंसक घटना।

विज्ञापन और अखबार की दुनिया

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया

बात करें यदि टीवी पर प्रसारित विज्ञापनों की जो हमें यह मानने पर बाध्य करते है, कि यदि फलां वस्तु आपके पास नही है तो आप दुनिया के सबसे हीन, दयनीय और बेकार इंसान हैं। साथ ही विज्ञापनों में नारी का जो रूप दिखाया जाता है, वह भारत की शोषित, दमित स्त्री की मुक्ति का लक्ष्य बाजार में साबुन बेचने वाली स्त्री नहीं हो सकती।

एक दौर ऐसा था जब स्वतंत्रता की लड़ाई में अखबारों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था, लेकिन आज अखबार भी एक एजेंडे के अंतर्गत कार्य कर रहे हैं तो वहीं उसमें छपने वाले संपादकीय भी एकपक्षीय होकर रह गए है। साथ ही अखबारों में विज्ञापनों की भरमार के चलते आम आदमी की समस्याएं अखबार के एक कोने में दबा दी जाती है, क्योंकि मीडिया अब कॉरपोरेट सेक्टर जो हो चला है।

ऐसे में मीडिया का वर्तमान स्वरूप कुछ ऐसा हो चला है, कि ज्यों ज्यों दवा की, त्यों त्यों मर्ज बढ़ता चला गया। यानि कि जिस मीडिया के दम पर तमाम देशों ने अपनी-अपनी आजादी की लड़ाइयां लड़ी थी। अब वह मीडिया सरकारी और नामचीन घरानों के इशारों पर नीति निर्धारण करने के अतिरिक्त कुछ नहीं है, ऐसे में मीडिया की भूमिका पर पुनं विचार विमर्श करना ही एक प्रगतिशील समाज की वर्तमान जरूरत है।

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Anshika Johari

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